OSI Model क्या है और कितनी Layers है (OSI Model in Hindi)

OSI Model Layers in Hindi: अगर आप थोडा बहुत इंटरनेट और टेक्नोलॉजी में रूचि रखते हैं तो आपने कभी ना कभी OSI Model के बारे में जरुर सुना होगा. पर क्या आप जानते हैं Network OSI Model क्या है, OSI मॉडल में कितनी लेयर होती हैं, OSI मॉडल की सभी लेयर का कार्य क्या है, OSI मॉडल की विशेषता क्या है, OSI मॉडल के फायदे व नुकसान क्या हैं तथा OSI मॉडल और TCP/IP में अंतर क्या है.

अगर आप OSI मॉडल के बारे में उपरोक्त सभी जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आप एकदम सही लेख पर हैं. इस लेख में हम आपको नेटवर्क OSI Model के बारे में सम्पूर्ण विस्तृत जानकारी प्रदान करने वाले हैं.

OSI Model क्या है और कितनी Layers है (OSI Model in Hindi)

जब टेक्नोलॉजी की शुरुवात ही हुई थी तभी OSI मॉडल को विकसित किया गया था. पहले के समय में एक कंपनी के डिवाइस को दुसरे कंपनी के डिवाइस के साथ कनेक्ट करने में बहुत अधिक समस्या का सामना करना पड़ता था. इसी समस्या के समाधान में OSI मॉडल का कांसेप्ट सामने आया. OSI मॉडल के बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए लेख को अंत तक पढना जारी रखें.

तो चलिए आपका अधिक समय ना लेते हुए शुरू करते हैं इस लेख को और जानते हैं OSI Model क्या है हिंदी में.

OSI Model क्या है (What is OSI Model in Hindi)

OSI जिसका फुल फॉर्म Open Systems Interconnection होता है, इसे ISO (International Organization for Standardization) के द्वारा 1984 में विकसित किया गया था. OSI Model एक conceptual framework है जिसका उपयोग नेटवर्किंग कार्यों के वर्णन के लिए किया जाता है. 

OSI नेटवर्क मॉडल नेटवर्क में जुड़ने वाले दो डिवाइस के बीच में कम्युनिकेशन के लिए Reference का कार्य करती है, यह TCP/IP नेटवर्क मॉडल का Reference Model है. OSI नेटवर्क मॉडल का Real Life में कोई इस्तेमाल नहीं होता है, Real Life में TCP/IP का ही इस्तेमाल किया जाता है.

OSI नेटवर्क में 7 लेयर होती हैं जिन सभी का कार्य भी अलग – अलग होता है, यह 7 परतें सुनिश्चित करती हैं कि डेटा एक डिवाइस से दुसरे डिवाइस तक सुरक्षित रूप से उपयुक्त मार्ग के द्वारा पहुंचें. ये सभी परतें एक दुसरे पर निर्भर नहीं रहती हैं लेकिन डेटा ट्रांसमिशन एक लेयर से दुसरे लेयर में होता है.

विभिन्न नेटवर्किंग डिवाइस बनाने वाली कंपनियां OSI Model को फॉलो करते हुए ही नेटवर्किंग डिवाइस को बनाती है ताकि दो अलग – अलग कंपनियों के नेटवर्किंग डिवाइस आपस में संचार कर सके. OSI Model के आने से पहले दो विभिन्न कंपनियों के नेटवर्किंग डिवाइस को आपस में कनेक्ट कर पाना बहुत मुश्किल था इसलिए इस नेटवर्क मॉडल को विकसित किया गया.

कुल मिलाकर कहें तो OSI Model एक ऐसा Reference Model या प्रोटोकॉल है जो यह परिभाषित करता है कि नेटवर्क में डिवाइस के बीच डेटा कैसे भेजा या प्राप्त किया जाता है.

OSI Model का फुल फॉर्म

OSI का फुल फॉर्म Open Systems Interconnection होता है. जिसे हिंदी में अनावृत तंत्र अंतरसंबंध कहा जाता है.

OSI Model को किसने बनाया

OSI Model को 1984 में ISO के द्वारा बनाया गया था. इसे ऐसे समय पर बनाया गया था जब टेक्नोलॉजी अपनी शुरुवाती दौर में थी. OSI मॉडल को आज भी नेटवर्क का Architecture समझने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

OSI मॉडल की परतें (OSI Model Layers in Hindi)

OSI Model की मुख्य रूप से 7 लेयर होती हैं. ये लेयर एक दुसरे के साथ डेटा ट्रान्सफर करती हैं लेकिन एक दुसरे पर आपस में निर्भर नहीं रहती है. इन सभी लेयर का काम अलग – अलग होता है. इनकी मदद से डेटा का एक स्थान से दुसरे स्थान में ट्रान्सफर करना आसान हो जाता है. OSI मॉडल की सभी लेयर के बारे में हमने आपको नीचे विस्तार से बताया है.

OSI Model लेयर परतों का नाम
Layer 7Application
Layer 6Presentation
Layer 5Session
Layer 4Transport
Layer 3Network
Layer 2Data Link
Layer 1Physical
OSI Model Layers
OSI Model Layers

1. Physical Layer (भौतिक परत)

OSI मॉडल में Physical Layer सबसे पहली और सबसे नीचे की परत होती है. यह नेटवर्क Nodes के बीच फिजिकल केबल और वायरलेस कनेक्शन के लिए responsible होती है. यह नेटवर्क में डिवाइस के बीच कनेक्शन स्थापित करने वाले कनेक्टर, केबल या वायरलेस टेक्नोलॉजी को define करता है और Raw Data का प्रसारण करता है. नेटवर्क टोपोलॉजी का कार्य भी इसी लेयर में किया जाता है. फिजिकल लेयर को बिट यूनिट भी कहा जाता है.

Physical Layer के कार्य

OSI मॉडल के फिजिकल लेयर के कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • Bit synchronization – फिजिकल लेयर बिट्स का सिंक्रनाइज़ेशन प्रदान करती है है जिसके लिए वह एक Clock का इस्तेमाल करती है. यह Clock Receiver और Sender दोनों को कण्ट्रोल करती है और इस प्रकार से बिट स्तर पर सिंक्रनाइज़ेशन प्रदान करती है.
  • Bit Rate Control – फिजिकल लेयर ट्रांसमिशन रेट यानि प्रति सेकंड भेजे गए बिट कि संख्या को परिभाषित करती है.
  • Physical Topology – विभिन्न डिवाइसेस को नेटवर्क में किस प्रकार से व्यवस्थित किया जाता है इसे specifies करने का काम फिजिकल लेयर का ही होता है.
  • Transmission Mode – नेटवर्क में किस प्रकार दो उपकरणों के बीच डेटा ट्रान्सफर होता है फिजिकल लेयर उसे Define भी करती है.

2 – Data Link Layer (डेटा लिंक परत)

Data Link Layer पर सीधे Nods का उपयोग Node to Node डेटा ट्रान्सफर करने के लिए किया जाता है. डेटा लिंक लेयर फिजिकल लेयर पर होने वाले त्रुटियों को भी ठीक करती है. इस लेयर का मुख्य कार्य होता है कि यह सुनिश्चित करना फिजिकल लेयर पर डेटा ट्रान्सफर एक नोड से दुसरे नोड में त्रुटी रहित हो. OSI प्रोटोकॉल के डाटा लिंक लेयर पर सिंगल पैकेट को frame unit रूप में जाना जाता है

Data Link Layer के भी दो Sub Layer होते हैं –

  • Logic Link Control (LLC)
  • Media Access Control (MAC)

MAC एक नेटवर्क पर डिवाइस ट्रांसमिशन फ्लो कंट्रोल और मल्टीप्लेक्सिंग प्रदान करता है जबकि दूसरा LLC Physical Medium पर फ्लो और एरर कंट्रोल प्रदान करता है और लाइन प्रोटोकॉल की भी पहचान करता है. 

LLC Sub Layer यह भी निर्धारित करता है कि डेटा लिंक लेयर में जो कनेक्शन होता वह कनेक्शन रहित होगा या कनेक्शन युक्त.

MAC Sub Layer फिजिकल मीडिया के साथ कनेक्ट होने के लिए जिम्मेदार होता है. DLL की MAC सब लेयर में डिवाइस की फिजिकल एड्रेस जिसे कि MAC एड्रेस भी कहते हैं, को भी पैकेट में Add किया जाता है.

रिसीवर का MAC एड्रेस तार पर एक ARP(Address Resolution Protocol) Request रखकर “IP एड्रेस किसके पास है” प्राप्त किया जाता है और destination host अपने MAC address का reply देगा.

डेटा लिंक लेयर उन डेटा पैकेट को Receive करता है जिसे कि नेटवर्क लेयर के द्वारा भेजा गया होता है और उसके बाद इन्हें फ्रेम में Convert करता है जिन्हें कि नेटवर्क में भेजा जाना होता है. DLL फेम में Sender और Receiver  डिवाइस का MAC एड्रेस भी Add करते हैं.

Data Link Layer के कार्य

  • Farming – Framing डेटा लिंक लेयर का एक कार्य है, यह Sender को बिट्स के एक सेट को ट्रांसमिट करने का एक तरीका प्रदान करती है.
  • MAC Address – फ्रेम बनाने के बाद डेटा लिंक लेयर प्रत्येक फ्रेम के हैडर में Sender और Receiver के MAC एड्रेस को Add करता है.
  • Flow Control – DLL Flow को कंट्रोल करता है और डेटा रेट को दोनों तरफ स्थिर करता है. अगर डेटा रेट दोनों तरफ स्थिर नहीं होगा तो डेटा corrupt  हो सकता है. Flow Control डेटा की मात्रा को समन्वयित करता है.
  • Error Control – डेटा लिंक लेयर त्रुटी का नियंत्रण प्रदान करता है, जिसमें यह खोये हुए फ्रेमों का पता लगता है और उन्हें retransmit करता है.

3 – Network Layer (नेटवर्क परत)

नेटवर्क लेयर डेटा लिंक लेयर से प्राप्त फ्रेम को प्राप्त करके और उनके अन्दर लिखे एड्रेस के आधार पर उनके intended destination तक पहुंचाने के लिए responsible है. इसके साथ ही नेटवर्क लेयर फ्रेम को प्रसारित करने के लिए उपलब्ध मार्गों में से सबसे छोटा रास्ता चुनती है.

नेटवर्क लेयर Logical Layer जैसे IP एड्रेस का उपयोग करके destination को Find करती है.नेटवर्क लेयर पर राऊटर एक महत्वपूर्ण कॉम्पोनेन्ट होता है जिसका उपयोग इनफार्मेशन को रूट करने के लिए किया जाता है जहाँ इसे नेटवर्क के बीच जाने की जरुरत होती है.

Network Layer के कार्य

  • Logical Addressing – नेटवर्क लेयर हैडर पर Sender और Receiver के IP एड्रेस को रखता है जिसके द्वारा इन्टरनेट नेटवर्क पर प्रत्येक डिवाइस कि पहचान की जाती है. प्रत्येक इन्टरनेट डिवाइस का अपना यूनिक IP एड्रेस होता है.
  • Routing – नेटवर्क लेयर यह निर्धारित करता है कि कौन सा रास्ता फ्रेम के लिए सबसे छोटा और उपयुक्त है.
  • Internetworking – नेटवर्क लेयर का यह मुख्य कार्य होता है कि वह विभिन्न नेटवर्क को इंटरनेटवर्किंग प्रदान करें. इसी लेयर के कारण हम विभिन्न नेटवर्क को एक साथ Combine करके बड़ी नेटवर्क बना सकते हैं.

4 – Transport Layer (ट्रांसपोर्ट लेयर)

ट्रांसपोर्ट लेयर डेटा पैकेट की डिलीवरी और त्रुटियों को Check करती है. यह size sequencing और सिस्टम तथा होस्ट के बीच डेटा ट्रान्सफर को नियंत्रित करता है. ट्रांसपोर्ट लेयर का सबसे सामान्य उदाहरण TCP या ट्रांसमिशन प्रोटोकॉल है.

इसके अलावा ट्रांसपोर्ट लेयर नेटवर्क लेयर से सेवायें लेकर एप्लीकेशन लेयर को प्रदान करती है. ट्रांसपोर्ट लेयर में डेटा को Segment के रूप में संदर्भित किया जाता है. ट्रांसपोर्ट लेयर पूरे मैसेज की End to End डिलीवरी के लिए जिम्मेदार है. ट्रांसपोर्ट लेयर सफल डेटा ट्रांसमिशन की स्वीकृति भी प्रदान करता है और यदि कोई त्रुटी पायी जाती है तो डेटा को पुनः प्रसारित करता है.

ट्रांसपोर्ट लेयर Sender की तरफ से Upper लेयर से formatted data प्राप्त करता है उसे Segment में विभाजित करता है और डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करने के लिए Flow & Error Control भी implement करता है. यह हैडर में सोर्स और डेस्टिनेशन पोर्ट नंबर भी Add करता है और डेटा Segment को नेटवर्क लेयर में फॉरवर्ड करता है.

Receiver की तरफ से ट्रांसपोर्ट लेयर अपने हैडर से पोर्ट नंबर पढता है और सम्बंधित एप्लीकेशन को डेटा फॉरवर्ड कर देता है. साथ में ही यह डेटा Segment की sequencing और reassembling भी करता है.

Transport Layer के कार्य

  • Segmentation and Reassembly – यह Session Layer से मैसेज को Accept करती है और मैसेज को छोटे – छोटे इकाइयों में विभाजित करती है. डेस्टिनेशन स्टेशन पर ट्रांसपोर्ट लेयर मैसेज को पुनः संयोजित करती है.
  • Service Point Addressing – मैसेज को सही प्रोसेस से पहुँचाने के लिए ट्रांसपोर्ट लेयर हैडर में एक एड्रेस शामिल होता है जिसे सर्विस पॉइंट एड्रेस या पोर्ट एड्रेस कहा जाता है. इस प्रकार से एड्रेस को निर्दिष्ट करके, ट्रांसपोर्ट लेयर यह सुनिश्चित करती है कि संदेश सही प्रक्रिया तक पहुँचाया गया है.
  • Flow Control – डेटा लिंक लेयर की भांति ही ट्रांसपोर्ट लेयर Flow Control करती है. ट्रांसपोर्ट लेयर यह सुनिश्चित करती है कि Sender और Receiver  के बीच कम्युनिकेशन एक ऐसे Rate में हो जिसे दोनों हैंडल कर सके.
  • Error Control – ट्रांसपोर्ट लेयर end–to–end एरर कंट्रोल भी परफॉर्म करती है, जिसमें यह सुनिश्चित करती है कि Sender ट्रांसपोर्ट लेयर के द्वारा भेजे गए मैसेज को Receiver ट्रांसपोर्ट लेयर पर बिना किसी डैमेज या Loss के पहुंचें.

5 – Session Layer (सत्र परत)

Session Layer विभिन्न कंप्यूटरों के बीच कम्युनिकेशन को कंट्रोल करती है. यह परत कनेक्शन की स्थापन, सेशन को मेन्टेन और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती है. इसके साथ ही सेशन लेयर व्यवस्थित संचार प्रदान करते हैं, इसके लिए उन्हें Data Flow को regulate करना होता है.

Session Layer के कार्य

  • Session Control – सेशन लेयर दो प्रोसेस को स्थापित करने, उपयोग करने और समाप्त करने को Allow करती है.
  • Dialog Control – सेशन लेयर दो सिस्टम को half-duplex और full-duplex में संचार करने की अनुमति देते हैं.
  • Synchronization – सेशन लेयर एक प्रोसेस को checkpoints को जोड़ने की अनुमति देती है जिन्हें डेटा में synchronization point माना जाता है. यह synchronization points त्रुटियों की पहचान करने में मदद करते हैं ताकि डेटा को पुनः सिंक्रोनाइज़ किया जा सके जिससे Data Loss होने से बचाया जा सके.

6 –  Presentation Layer (प्रेजेंटेशन लेयर)

प्रेजेंटेशन लेयर को ट्रांसलेशन लेयर भी कहा जाता है क्योंकि यह एप्लीकेशन के द्वारा Accept किए गए सिंटैक्स के आधार पर एप्लिकेशन लेयर के लिए डेटा को ट्रांसलेट करता है. इसे आप नेटवर्क का एक ट्रांसलेटर भी समझ सकते हैं.

Presentation Layer के कार्य

  • Translate Data – डेटा को ट्रांसलेट करता है जिसके बाद उसे एप्लीकेशन लेयर के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है.
  • Encryption & Description – प्रेजेंटेशन लेयर एप्लीकेशन लेयर के द्वारा आवश्यक एन्क्रिप्शन और डिक्रिप्शन को भी हैंडल करती है.
  • Data Compression – यह उन बिट की संख्या को कम कर देती है या Compress कर देती है जिसे नेटवर्क में ट्रांसपोर्ट किया जाना होता है.

7 – Application Layer (एप्लीकेशन लेयर)

OSI नेटवर्क मॉडल की यह सबसे उपरी परत होती है जिस पर end user और एप्लीकेशन लेयर दोनों सीधे एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के साथ interact करते हैं. यह लेयर नेटवर्क एप्लीकेशन के द्वारा implement की जाती है. यह एप्लीकेशन डेटा को produce करती है जिसे नेटवर्क पर ट्रान्सफर करना होता है.

यह परत एप्लिकेशन सेवाओं के लिए नेटवर्क तक पहुंचने और यूजर को प्राप्त इनफार्मेशन Display करने के लिए एक विंडो के रूप में भी कार्य करती है. एप्लीकेशन लेयर end user एप्लीकेशन (जैसे वेब ब्राउज़र, ऑफिस) को प्रदान की जाने वाली नेटवर्क सर्विस को देखती है.

Application Layer के कार्य

  • Network Virtual Terminal
  • Directory Services
  • Electronic Message
  • Remote File Access
  • Network Management

OSI मॉडल की विशेषतायें (Feature of OSI Model in Hindi)

OSI मॉडल की कुछ प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं –

  • OSI मॉडल को 2 लेयर में विभाजित किया जाता है Upper Layer और Lower Layer. Upper layer में एप्लीकेशन, प्रेजेंटेशन, सेशन और ट्रांसपोर्ट को शामिल किया जाता है और Lower Layer में नीचे की तीन परतों डेटा लिंक, नेटवर्क और फिजिकल लेयर को शामिल किया जाता है.
  • OSI मॉडल के द्वारा ही नेटवर्क पर कम्युनिकेशन को समझा जा सकता है.
  • OSI मॉडल में 7 परतें होती हैं और इन सभी का काम भिन्न – भिन्न होता है.
  • OSI मॉडल एक Reference Model है जिसका व्यवहारिक रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
  • OSI मॉडल के द्वारा आप हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के एक साथ कार्य करने की प्रोसेस को समझ सकते हैं.

OSI मॉडल के फायदे (Advantage of OSI Model in Hindi)

OSI नेटवर्क मॉडल के अनेक सारे फायदे हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख फायदों के बारे में हमने आपको निम्नवत बताया है –

  • कंप्यूटर नेटवर्किंग में OSI मॉडल एक मानक मॉडल है.
  • OSI मॉडल सबसे सामान्य मॉडल है जिसका इस्तेमाल किसी भी नेटवर्क मॉडल को विकसित करने के लिए एक guidance टूल के रूप में उपयोग किया जाता है.
  • OSI मॉडल दोनों प्रकार सर्विस कनेक्शन रहित और कनेक्शन युक्त को सपोर्ट करती है.
  • OSI मॉडल flexible है जो सर्विस, इंटरफ़ेस और प्रोटोकॉल को अलग करता है.
  • OSI मॉडल में एक परतें दुसरे पर निर्भर नहीं रहती हैं, यदि एक परत में कुछ बदलाव कर दिए जाते हैं तो यह अन्य परतों को प्रभावित नहीं करती है.
  • OSI मॉडल बहुत ही सिक्योर है.
  • OSI मॉडल में आप किसी भी प्रोटोकॉल को उपयोग में ले सकते हैं.

OSI Model के नुकसान (Disadvantage of OSI Model in Hindi)

आज OSI मॉडल का इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जाता है लेकिन इसमें अभी भी कुछ कमियां हैं. OSI मॉडल के कुछ नुकसान या कमियां निम्नलिखित हैं –

  • OSI मॉडल केवल एक सैद्धांतिक मॉडल है जिसका वास्तव में इस्तेमाल नहीं किया जाता है.
  • OSI मॉडल में विभिन्न परतों में सेवाओं को दोहराया जाता है. जैसे Flow Control, Error Control आदि.
  • हालाँकि OSI मॉडल में 7 परतें होती हैं लेकिन कुछ परतें जैसे सेशन, प्रेजेंटेशन अन्य परतों के जितनी उपयोगी नहीं हैं.
  • OSI मॉडल किसी भी प्रोटोकॉल पर काम कर सकते हैं, लेकिन अक्सर नए प्रोटोकॉल implement करते समय OSI मॉडल में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.
  • OSI मॉडल बहुत जटिल है. इसमें initial implementation बहुत ही धीमा और महंगा था. 
  • OSI मॉडल व्यवहारिक जरूरतों के साथ – साथ TCP/IP मॉडल को भी पूरा नहीं करता है.

OSI Model और TCP/IP Model में अंतर

OSI मॉडल और TCP/IP मॉडल के बीच अंतर को हमने नीचे टेबल के द्वारा आपको समझाया है.

OSI ModelTCP/IP Model
इसे ISO के द्वारा Develop किया गया है.इसे ARPANET के द्वारा Develop किया गया है.
OSI मॉडल का फुल फॉर्म ओपन सिस्टम इंटरकनेक्शन होता है.TCP का फुल फॉर्म ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल होता है.
OSI मॉडल का व्यवहारिक इस्तेमाल नहीं किया जाता है यह केवल सैद्धांतिक मॉडल है.TCP/IP मॉडल का इस्तेमाल व्यवहारिक रूप से किया जाता है.
OSI मॉडल में सात परतें होती हैं.TCP लेयर में केवल चार परतें होती हैं.
OSI मॉडल सर्विस, प्रोटोकॉल और इंटरफ़ेस के बीच अंतर स्पष्ट करता है.TCP/IP मॉडल सेवाओं, इंटरफ़ेस और प्रोटोकॉल के बीच अंतर स्पष्ट नहीं करता है.
OSI नेटवर्क लेयर के द्वारा रूटिंग स्टैण्डर्ड और प्रोटोकॉल को परिभाषित करता है.TCP केवल इन्टरनेट लेयर का उपयोग करता है.
OSI मॉडल में डेटा लिंक लेयर और फिजिकल लेयर दोनों अलग – अलग हैं.TCP में डेटा लिंक और फिजिकल लेयर दोनों को सिंगल होस्ट नेटवर्क लेयर में संयोजित किया जाता है.
OSI मॉडल में न्यूनतम हैडर साइज़ 5 bytes का है.TCP/IP मॉडल में न्यूनतम हैडर साइज़ 20 bytes का है.
OSI मॉडल को इन्टरनेट आने के बाद Define किया गया है.TCP/IP मॉडल को इन्टरनेट आने से पहले Define किया गया था.
Difference between OSI Model and TCP/IP Model In Hindi

FAQ For OSI Model in Hindi

OSI मॉडल का फुल फॉर्म क्या है?

OSI मॉडल का फुल फॉर्मOpen Systems Interconnection है.

OSI मॉडल को किसने बनाया था?

OSI मॉडल को 1984 में ISO के द्वारा विकसित किया गया था.

OSI मॉडल में कितनी लेयर होती हैं?

OSI मॉडल में सात लेयर होती हैं.

OSI मॉडल का इस्तेमाल कहाँ किया जाता है?

OSI मॉडल इन्टरनेट में इस्तेमाल किया जाने वाला एक प्रमुख प्रोटोकॉल है जिसके विभिन्न लेयर होते हैं और इन सभी लेयरों के कार्य भी अलग – अलग होते हैं. यह नेटवर्क में डिवाइस के बीच कम्युनिकेशन स्थापित करने के तरीके और नेटवर्क में दो डिवाइस के बीच डेटा ट्रांसमिशन को परिभाषित करता है.

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निष्कर्ष: ओएसआई मॉडल क्या है हिंदी में

आज के इस लेख में हमने आपको मुख्य रूप से OSI Model Kya Hai In Hindi और OSI मॉडल के सात लेयर के बारे में समझाया है, हमने कोशिस की है आपको OSI नेटवर्क मॉडल से जुडी हर एक आवश्यक जानकारी प्रदान करवा सकें. इस लेख को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि OSI Model के द्वारा नेटवर्क में डेटा कैसे ट्रान्सफर होता है.

उम्मीद करते हैं आपको हमारे द्वारा लिखा गया यह लेख पसंद आया होगा तथा आप OSI नेटवर्क मॉडल को अच्छे से समझ गए होंगें. इस टेक्नोलॉजी की जानकारी को अपने दोस्तों के साथ भी सोशल मीडिया के द्वारा जरुर शेयर करें, और टेक्नोलॉजी के बारे में इसी प्रकार के ज्ञानवर्धक लेख पढने के लिए हमारे ब्लॉग पर आते रहिये.

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